सबद-3


सबद-3

ओ३म् मोरै अंग न अलसी तेल न मलियो। 
ना परमल पीसायों ।। 
जीमत पीवत भोगत बिलसत दीसां नाहीं। 
म्हापण को आधारूं ।। 
अड़सठ तीरथ हिरदा भीतर ।
बाहर लोका चारूं । 
नान्हीं मोटी जीया जूँणी । 
एती सास फुरंतै सारूं ।। 
बासंदर क्यूँ एक भणीजै । 
जिहिं कै पवन पिराणों ।। 
आला सूका मेल्है नाहीं । 
जिहिं दिश करै मुहाणों ।। 
पापे गुन्हे वीहै नाहीं । 
रीस करै रीसाणों।। 
बहूली दौरे लावण हारूं । 
भावै जाण मैं जाणूं ।। 
न तूं सुरनर, न तू शंकर । 
न तू राव न राणों ।। 
काचै पिंड अकाज चलावै महा अधूरत दाणों । 
मौरे छुरी न धारू लोह न सारूं हथियारूं । 
सूरज को रिप बिहंडा नाहीं
तातै कहां उठावत भारू ।। 
जिहिं हाकणड़ी बलद जू हाकै 
न लोहै की आरूं  ।।३।।

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