सबद-85
ओ३म् भोम भली कृषाण भी भला । खेवट करो कमाई ।। गुरु प्रसाद काया गढ़ खोजो । दिल भीतर चोर न जाई ।। थलिये आय सतगुरु परकाश्यो । जोलै पड़ी लोकाई ।। एक खिण मांहि तीन भवन म्हे पोखां । जीवां जूण सवाई।। करण समो दातार न हूवो । जिन कंचन बाहू उठाई ।। सोई कवीसा कवल नवेड़ी । जिण सुरह सुबछ। दुहाई । मेर समो कोई कर न देख्यो । सायर जिसीं तलाई ।। लंक सरीखो कोट न देख्यो । समंद सरीखी खाई ।। दशरथ सो कोई पिता न देख्यो । देवल देसी माई ।। सीत सरीखी तिरिया न देखी । गरब न करीयों काई ।। हनमत सो कोई पायक न देख्यो । भीम जैसी सबलाई ।। रावण सो कोई राव न देख्यो । जिण चोहचक आन फिराई ।। एक तिरिया कै राहा बेधी । लंका फेर बसाई ।। संखा मोहरा सेतम सेतूं । ताक्यूं बिलगै कांई ।। ब्राह्मण था ते बेदे भूला । काजी कलम गुमाई ।। जोग बिहूंणा जोगी भूला । मुंडीया अकल न कोई ।। इहिं कलयुग मैं दोय जन भूला । एक पिता एक माई ।। बाप जाणै मेरे हलीयो टोरै । कोहर सींचण जाही ।। | माय जाणै मेरै बहुटल आवै । बाजै बिरद बधाई ।। म्हे शिंभू का फरमाया आया । बैठा तखत रचाई ।। दोय भुजडंडे परवत तोलां । फेरां आपण राई ।। एक पलक मैं सर्ब संतोषां जीया जूण सवाई ।। जूगां-जूगां को जोगी आयो। बैठो आसन धारीं ।। हाली पूछै पाली पूछै। यह कलि पूछण हारी ।। थली फिरंतो खिलेरी पूछै । मेरी गुमाई छाली।। बांण चहोड़ पारधियो पूछै । किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी ।। । रहोरे मूर्खा मुग्ध गंवारा । करो मजूरी पेट भराई ।। है है जायो जीव न घाई । मैड़ी बैठो राजेन्द्र पूछे । स्वामी जी कती एक आयु हमारी ।। चाकर पूछे ठाकर पूछै और पूछे कीर कहारी।। सोक दुहागण तेपण पूछै । ले ले हाथ सुपारी।। बांझ तिरिया बहुतेरी पूछे । किसी परापति म्हारी ।। त्रेता जुग मैं हीरा विणज्या । द्वापुर गऊ चराई ।। वृन्दावन मैं बंसी बजाई । कलजुग चारी छाली ।। नव खेड़ी म्हें आगै खेड़ी । दशवें कालंके की बारी ।। उत्तम देश पसारो मांड्यो । रमण बैठो जुवारी ।। एक खंड बैठा नवखंड जीता । को ऐसो लहो जुवारी ।।८५।।