सबद-40


सबद-40

ओ३म् सप्त पताले तिहूं तृलोके चवदा भवने गगन गहीरे ।। बाहर भीतर सर्व निरंतर । जहां चीन्हों तहां सोई ।। सतगुरु मिलियों सतपंथ बतायो । भ्रांत चुकाई । अवर न बुझबा कोई ।।४०।।