सबद-30 (कुंचीवाला)

सबद-30 (कुंचीवाला) 

ओ३म् आयो हंकारो जीवड़ो बुलायो । कह जिवड़ा के करण कमायो? थरहर कंपै जिवड़ो डोलै उत माई पीव न कोई बोलै ।। सुकरत साथ सगाई चालै । स्वामी पवणा पाणी नवण करंतो।। चंदे सूरे शीस निवन्तो। विष्णु सुरां पोह पछ लहन्तो ।। इहिं खोटे जन मन्तर स्वामी । अहनिश तेरो नाम जपंतो ।। निगम कमाई मांगी मांग । सुरपति साथ । सुरा सू रंग ।। सुरपति साथ सुरां सूं मेलो । निज पोह खोज ध्याइये ।। भोम भली कृषाण भी भला । बूठो है जहां बाहिये ।। करषण करो सनेही खेती । तिसिया साख निपाइये ।। लुणचुण लीयो मुरा तब कीयो ।। कण काजै खड़ गाहिंये ।। कणतुस झेड़ो होय नवेड़ो । गुरुमुख पवण उड़ाइये ।। पवणा डोलै तुस उडैलो । कणले अर्थ लगाइये ।। यूं क्यू भलो जे आप न जरिये ।। औरां अजर जराइये ।। यूं क्यूं भलो जे आप न फरिये । अवरां अफर फराइये ।। यूं क्यूं भलो जे आप न डरिये । अवरां अडर डराइये ।। ये क्यूं भलो जे आप न मरिये । अवरा मारण धाइये ।। पहलै किरिया आप कमाइये । तो औरां न फरमाइये । जो कुछ कीजै मरणै पहले । मत भल कहि मर जाइये ।। शौच स्नान करो क्यूं नाहीं । जिवड़ा काजै न्हाइये ।। शौच स्नान कियो  जिन नाहीं । होय भंतूला बहाइये ।। शील बिबरजित जीव दुहेलो । यमपुरी ये संताइये ।। रतन काया मुख सूवर बरगो ।। अबखल झंखे पाइये । सवामण सोनो करणे पाखो । किण पर वाह चलाइये । एक गऊ ग्वाला ऋषि मांगी । करण पखो किण सुरह सुबच्छ दुहाइये । करण पखो किण कंचन दीन्हों । राजा कवन कहाइये ।। रिण ऋध्ये स्वामी करण पाखो । कुण हीराडसन पुलाइये । किहिं निश धर्म हुवै धुर पूरो । सुर की सभा समाइये ।। जे नविये नवणी खविये खवणीं । जरिये जरणी। करिये करणी । तो सीख हुयां घर जाइये ।। अहनिश धर्म हुवै धुर पूरो । सुर की सभा समाइये ।। किहिं गुण बिदरो पार पहूंतो । करणै फेर बसाइये ।। मन मुख दान जु दीन्हों करणै । आवागवण जु आइये ।। गुरुमुख दान जु दीन्हों बिदरै । सुर की सभा समाइये ।। निज पोह पाखो पार असी पुर । जाणी गीत बिवाहे गाइये ।। भरमी भूला वाद विवाद । आचार बिचार न जाणत स्वाद । कीरत के रंग राता मुरखा  मन हठ मरै । ते पार गिराये कित उतरै ।।३०।।