सबद-28
ओ३म् मच्छी मच्छ फिरै जल भीतर । तिहिं का माघ न जोयबा ।। परम तंत है ऐसा । आछै उरबार न ताछै। पारूं ।। ओवड़ छेवड़ कोई न थीयों । तिहिं का अन्त लहीबा कैसा ।। ऐसा लो भल ऐसालो । भल कहो न कहा गहीरूं ।। परम तंत के रूप न रेखा । लीक न लेहूं खोज न खेहूं ।। बर्ण बिबरजत । भावैं खोजो बांवन बीरू ।। मीन का पंथ मीन ही जांणै । नीर सुरंगम रहीयूं ।। सिध का पंथ कोई साधू जाणत । बीजा बरतन बहियों ।।२८।।