सबद-18
ओ३म् जांकुछ-जांकुछ जां कछु न जांणी । नाकुछ-नाकुछ तां कुछ जांणी ।। नाकुछ-नाकुछ अकथ कहाणी । नांकुछ-नांकुछ अमृत बाणी । ज्ञानी सोतो ज्ञानी रोवत । पढ़िया रोवत गाहे ।। केल करन्ता मोरी मोरा रोवत । जोय-जोय पगां दिखाही ।। उरध खैणी मन उनमन रोवत। मुरखा रोवत धाहीं ।। मरणत माघ संघारत खेती । के के अवतारी रोवत राही ।। जड़िया बूंटी जे जग जीवै । तो बैदा क्यूं मर जाही ।। खोज पिरांणी ऐसा बिनाणीं। नुगरा खोजत नाहीं । जां कुछ होता ना कुछ होयसी । बल कुछ होयसी ताहीं ।।१८।।