सबद-14

सबद-14

         ओ३म् मोरा उपख्यान वेदूं कण तत भेदूं । शास्त्रे पुस्तके लिखणा न जाई ।। मेरा सबद खोजो । ज्यू सबदे  बद समाई।। हिंरणा दोह क्यूँ हिरण हतीलूँ । कृष्ण चरित बने क्यूँ बाघ बिडारत गाई ।। सुनही सुनहा का जाया । मुरदा बघेरी बघेरा न होयबा ।। कृष्ण चरित बिन । सीचाण कबहीं न सुजीऊं ।। खर का सबद न मधुरी बाणी ।। कृष्ण चरित बिन, श्वान न कबही गहीरूं ।। मुंडी का जाया मुंडा  न होयबा । कृष्ण चरित बिन, रीछां कबही न सुचीलूं ।। बिल्ली की इन्द्री संतोष न होयबा कृष्ण चरित बिन, काफरा न होयबा लीलूं ।। मुरगी का जाया मोरा न होयबा । कृष्ण चरित बिन, भाकला न होयबा चीरूं ।। दंत बिवाई जन्म ने आई ।। कृष्ण चरित बिन, लोहै पडे न काठ की सूलूं । नीबड़िये नारेल न होयबा । कृष्ण चरित बिन, छिलरे ने होयबा हीरूं ।। तूबण नागर बेल न होयबा। कृष्ण चरित बिन, बांवली न केली केलूं । गऊ का जाया खगा न होयबा। कृष्ण चरित बिन, दया न पालत भीलूँ ।। सूरी का  जाया हस्ती न होयबा। कृष्ण चरित बिन, ओछा कबही न पुरूं ।। कागण का जाया कोकला न होयबा । कृष्ण चरित  बिन, बुगली न जनिबा हंसू । ज्ञानी के हृदय प्रमोद आवत, अज्ञानी लागत डांसू ।।१४।।